असहमति का सम्मान स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान

टूलकिट मामले में पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि को मिली जमानत के उन लोगों के लिए राहत की खबर है जो भारत में लोकतंत्र और संविधान को मानते हैं। अदालत ने अपने जमानत आदेश में जिस तरह असहमति को स्वस्थ लोकतंत्र की बुनियाद बताते हुए इस बात पर जोर दिया है कि कोई व्यक्ति यदि सरकार से सहमत नहीं तो इसका मतलब राजद्रोह नहीं है, वह अपने आप में बहुत बड़ी चीज है। दुर्भाग्यवश पिछले कुछ वर्षों में हमारे देश में एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति विकसित हो चुकी है जिसमें वैचारिक मतभिन्नता के लिए जगह तंग होती जा रही है। सरकार अपने विचार को विपक्ष और आवाम पर थोपने को लेकर इस कदर आमादा है कि जो भी सरकार से सहमत नहीं वह देश का दुश्मन घोषित कर जेल में डाल दिया जा रहा है। सरकार का विरोध देश का विरोध नहीं है। अगर सरकार के गलत कार्यों और निर्णयों का विरोध नहीं होगा तो सरकार को अपनी गलतियों का अहसास कैसे होगा? एक स्वस्थ लोकतंत्र में सरकार को अपनी आलोचना को लेकर खुला होना चाहिए। साथ ही उसे इस तरह का माहौल भी बनाना चाहिए जिसमें लोकतंत्र के विभिन्न स्तम्भ और तमाम संवैधानिक व वैधानिक संस्थाएं बिना किसी भय या दबाव के निष्पक्ष होकर कार्य कर सकें। आज देश में सभी संस्थाएं कहीं न कहीं सरकार के दबाव में कार्य करती नजर आ रही हैं। यहाँ तक कि प्रेस और न्यायपालिका की भूमिका को लेकर भी तमाम तरह के सवाल पूछे जा रहे हैं, ऐसे में अगर हमने जनता की आवाज को भी पूरी तरह दबा दिया तब एक लोकतंत्र और तानाशाही में फर्क ही क्या रह जायेगा? लोकतंत्र पांच साल में एक बार उँगलियों पर स्याही लगवाने का ही नाम नहीं है बल्कि इसमें यह विचार भी निहित है कि जनता सरकार के हर निर्णय पर अपनी नजर रखे और निर्णय के गलत होने पर उस पर उंगली भी उठाये। यह देश सबका है। सबको संविधान और कानून के दायरे में अपनी बात कहने का अधिकार है। सरकार लोगों के संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों को मनमाने तरीकों से नहीं छीन सकती। अगर वह ऐसा करती है तो न सिर्फ वह शासन करने का नैतिक प्राधिकार खो देगी बल्कि उसमें और डाकुओं के गिरोह में कोई अंतर नहीं रह जायेगा। हालाँकि ऐसा होने की संभावना दूर दूर तक नजर नहीं आती है लेकिन यदि इस टूलकिट मामले में अदालत द्वारा दिए गए निर्णय से सरकार थोड़ा भी सीखने की इच्छा दिखाती है तो भारतीय लोकतंत्र के लिए यह शुभ संकेत होगा।

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