आजादी के बाद सात दशक बाद भारतीय लोकतंत्र, स्वास्थ्य सेवा तंत्र और समाज की दुखदायी तस्वीर

इन दिनों, उत्तर के कुछ हिंदी भाषी प्रदेशों से गंगा, यमुना और सरयू सहित कई नदियों में लोगों के पार्थिव शरीरों की दुर्दशा की जो भयावह ख़बरें देखने को मिल रही हैं, वह हमारे देश, इसके तंत्र, समाज और सभ्यता के लिए शर्मनाक हैं. लिखित इतिहास में ऐसा दूसरी बार हो रहा है.

पहली बार सन् 1918-20 में ऐसा हुआ था. तब हम गुलाम मुल्क थे. वह स्पेनिश फ्लू का भयानक समय था. ब्रिटिश हुकूमत ने सिर्फ हमें लूटा था, स्वास्थ्य, शिक्षा और प्रगति के क्षेत्र में उतना ही किया, जितना उसे अपने फायदे के लिए जरूरी लगा. उस फ्लू में पूरी दुनिया में मरने वालों की संख्या 4 करोड़ से ज्यादा आंकी गई थी. दुनिया में सबसे ज्यादा लोग भारत में मरे थे. यहां मरने वालों की संख्या पौने दो करोड़ और दो करोड़ के बीच आंकी गई थी. फ्लू के कुछ ही समय बाद प्लेग का कहर टूट पड़ा था.

महात्मा गांधी और उपन्यासकार प्रेमचंद जैसी अनेक बड़ी हस्तियां भी इस फ्लू के चपेट में आई थीं. बीमारी से लंबे संघर्ष के बाद दोनों बचे. हिंदी के मशहूर कवि निराला के परिवार के कई लोग मर गये. उन्होंने इस महामारी पर अपने संस्मरण में लिखा भी है.

तब हम गुलाम मुल्क थे-अविकसित, शोषण और अंधविश्वास से घिरे हुए. हमारे पास सक्षम स्वास्थ्य सेवा तंत्र नही था. लेकिन आज तो हम आजाद मुल्क हैं. सात दशक से ज्यादा हो गये आजाद हुए. हम विकासशील मुल्कों में भी ऊपर समझे जाते रहे हैं. अपनी छाती पर स्वतंत्र, विकासशील और लोकतंत्र का पोस्टर लटकाये इस विशाल मुल्क की विडम्बना देखिये कि सन् 2021 में भी हम देशवासी सन् 1918-20 के उन भयावह दिनों की शर्मनाक छवियां देखने को अभिशप्त हैं!

इन सात दशकों में हमने कैसा लोकतंत्र, कैसा स्वास्थ्य सेवा तंत्र और कैसा समाज बनाया?

यह आलेख हम वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश के फेसबुक पेज से साभार प्रस्तुत कर रहे हैं। लेख में व्यक्त विचार लेखक की निजी राय है।

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