आरक्षण बचाने की लड़ाई का नेतृत्व करें आरक्षण के लाभार्थी

डॉ. राजकुमार| भारत में आरक्षण बचाने की लड़ाई निर्णायक दौर में पहुँच चुकी है। आरक्षण रहेगा या समाप्त हो जायेगा यह बहुत जल्दी ही पूरी तरह साफ हो जायेगा। ऐसे में जो आरक्षण के लाभार्थी हैं यह बुनियादी तौर पर उनकी जिम्मेदारी है कि आरक्षण को बचाने बढ़ाने की लड़ाई का नेतृत्व करें। आपने देश के हर कार्यालय में हजारों की संख्या में अपनी ट्रेड यूनियन बनाई हैं। एससी/ एसटी/ ओबीसी के हितों की रक्षा करना आपका संवैधानिक अधिकार एवं नैतिक कर्तव्य है।

समाज पर हो रहे अन्याय, अत्याचार, दमन एवं शोषण पर अगर आरक्षण के लाभार्थी चुप रह जाते हैं तो यह अपेक्षा करना कि अपनी रोजी रोटी के लिए दिन रात संघर्ष करता समाज आपके आरक्षण को बचाने की लड़ाई भी लड़ेगा, बेमानी है। आरक्षण के लाभार्थियों को यह तथ्य समझना ही होगा कि हमारा वर्तमान पद, प्रतिष्ठा, समृद्धि समाज के खून पसीने का प्रतिफल है। हमारे पूर्वजों के अथक प्रयासों, अनगिनत संघर्षों एवं बलिदान के बाद हमें यह प्रतिनिधित्व मिल पाया है। अपनी नालायकी एवं व्यक्तिगत स्वार्थ के चलते अगर आज आरक्षण पर संकट के बादल छाए हुए हैं तो इसके लिए जिम्मेदार बहुत हद तक आरक्षण के लाभार्थी स्वयं ही हैं। हम समाज के प्रति गैर जिम्मेदार एवं उसके आंदोलन के प्रति कृतघ्न हो चुके हैं। इस कटु सत्य को हमें स्वीकार करना ही होगा कि हम सिर्फ आरक्षण लेने के लिए लिये ही उतावले हैं और ‘पे बैक टू सोसाइटी’ के सिद्धांत को व्यवहार में नहीं उतारते जिस कारण देर सबेर यह प्रतिनिधित्व भी षडयंत्रकारी मनुवादी निगल जाएंगे।

अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता एवं वैचारिक परिपक्वता को मजबूत कीजिए। फूले, बिरसा, पेरियार, अम्बेडकर के आन्दोलन को आधार बनाकर समाज की जडों को सींचिये, उसके दुख सुख को साझा कीजिए, समाज आपके आरक्षण की तरफ आंख उठाने वाले लोगों के इरादों को नेस्तनाबूद कर देगा। यही दीर्घकालीन सम्यक समाधान है।

लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर हैं। लेख में व्यक्त विचार लेखक की निजी राय है।

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