क्या बहुजन सामाजिक क्रांति के लिए कला और विचार साथ साथ चल रहे हैं

संजय श्रमण| मामला चाहे कबीर के मुंह से भक्ति और भाग्यवाद के वचन बुलवाने का हो या फिर गौतम बुद्ध को किसी का अवतार सिद्ध करने का हो या फिर डॉ अंबेडकर को ‘धर्म विशेष’ का समाज सुधारक सिद्ध करना हो, एक जरूरी बात हम नोट नहीं कर पाते हैं। भारत के ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति की परंपराओं को चबाकर पचा लेने वाले लोगों मे दो प्रयास समानांतर चलते हैं – एक विचार और दूसरा कला।
विचार से वे यह तय करते हैं कि कला का स्वरूप, मार्ग और लक्ष्य क्या होगा।
कला से वे यह सुनिश्चित करते हैं कि विचार किस रूप रंग और ध्वनि मे पहुंचेगा।
लेकिन बहुजनों के पास क्या है?
दुर्भाग्य से बहुजनों के पास विचार और कला दोनों होने के बावजूद उन्हे एक-दूसरे का पूरक बनाकर इस्तेमाल करने की इच्छा और मेहनत का अभाव है।
भारत की बहुजन जातियों के पास गीत है, नृत्य है, संगीत है, चित्रकला है और कला या ललित कला के नाम पर जो भी है वह सबकुछ है। असल मे इन सबको जन्म देने वाले भारत के बहुजन ही हैं।
लेकिन समस्या ये है कि भारत के बहुजन इन कलाओं के माध्यम से अपने आक्रामक और विराट नेरेटिव को आगे धकेलना नहीं चाहते। और इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि बहुत विचारपूर्वक इस तरह का कोई ग्रेंड नेरेटिव बहुजनों ने (कम से कम आधुनिक भारत मे) कभी बनाया ही नहीं।
ऐसे किसी ग्रैंड नेरेटिव के निर्माण की आवश्यकता को महसूस करने तक की सहमति तक पहुंचना भी अभी शुरू नहीं हुआ है।
दूसरी तरफ आप ब्राह्मणवाद को देखिए। हर कला – चाहे वह गीत संगीत और चित्रकला या नृत्य या नाट्य ही क्यों न हो, या किस्सागोई (कथा-प्रवचन), काव्य और गद्य या स्थापत्य ही क्यों न हो – उसके माध्यम से वेद वेदान्त के प्रतीकों से भरे बीज मन कि भूमि के एक एक इंच पर बोए जाते हैं।
कबीर उतने ही पढे पढ़ाए या गाए जाएंगे जितने से आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म सहित वेदांती रहस्यवाद सहित भक्ति आदि का महिमामंडन हो सके। महानतम शास्त्रीय गायक हों या लोक गायक हों वे भी कबीर को उतना ही गाएंगे जितने मे प्राचीन का महिमामंडन हो जाए, उससे आगे एक इंच भी नहीं जाने देंगे।
बुद्ध को भी निर्वाण और भवचक्र के नाश और साधना, मौन, शील, समाधि आदि तक सीमित रखेंगे। बुद्ध जहां जाति और लिंग भेद तोड़कर ज्ञान की मशाल सबके हाथों मे थमाने लगते है, उस बिन्दु को कथाओं, गीतों और प्रवचनों से गायब कर दिया जाता है।
रजिस्टर्ड भगवान हों या पद्म विभूषण और पद्म श्री प्राप्त सुर सम्राट हों – वे सब के सब बहुत सावधानी से अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं।
यही खेल डॉ अंबेडकर के साथ देखिए वे जहां तक पुराने समाज की कमजोरियों को उजागर करने का विमर्श देते हैं वहाँ तक सभी उन्हे थोड़ी बहुत ना-नुकूर के साथ अपना लेते हैं। लेकिन जब डॉ अंबेडकर समाधान के लिए समाज की संरचना और धर्म तक बदल डालने का विकल्प देते हैं तब सारे समझदार उन्हे समाज सुधारक और संविधान निर्माता की खोल मे सीमित करने के लिए दौड़ पड़ते हैं।
यह सब कैसे होता है?
यह होता है कला और विचार की शादी से।
बहुजनों की कला और विचार आपस मे न जाने कब से तलाक लिए बैठे हैं, वे एकदूसरे को गालियां देते हैं, कभी कभी एकदूसरे की याद भी आती है तो ‘वन नाइट स्टे’ भर का सत्संग करके फिर अलग हो जाते हैं। रणनीति और नेरेटिव नाम के बच्चे पैदा ही नहीं हो पाते।
भारत की जनजातीय परंपराओं मे नृत्य गीत और संगीत देखिए। लेकिन क्या उस नृत्य गीत और संगीत के साथ जुड़ी नैतिकता, समाज व्यवस्था और उसके सामाजिक राजनीतिक आदर्शों की व्याख्या करने वाला विचार बहुजनों ने विकसित किया है? क्या उस कला के साथ उस विचार के आक्रमण को अनिवार्य रूप से जोड़ने का प्रयास किया है?
भारत की ओबीसी या अनुसूचित जातियों के त्योहार देखिए गोवर्धन पूजा हो या फिर होली या दीपावली हो। क्या अनार्य असुर कृष्ण और राजा बली या इन सबके पूर्वज गौतम बुद्ध या महावीर से इन्हे जोड़कर प्रचारित करने का कोई प्रयास हुआ है?
अब फिल्मों पर आइए।
जातीय हिंसा और दमन सहित सामंती प्रष्ठभूमि पर बनी फिल्मों के बीच कबीर, बिरसा मुंडा, गौतम बुद्ध या डॉ अंबेडकर की एकदम भिन्न किस्म की धार्मिकता और नैतिकता का अनुमान देने वाली फिल्में भारत मे बनी हैं? जब हर कहानी मे शोषक और शोषित एक ही धार्मिक परंपराओं और देवी देवताओं सहित एक जैसे आध्यात्मिक प्रतीकों को पूजते दिखाए जाते हैं तब इस चित्रण पर कभी सवाल उठाए गए हैं?
ऐसे सवाल या तो नहीं उठाए गए हैं या फिर दबा दिए गए हैं।
असल समस्या यहीं है, भारत के ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों की कला और उनकी अपनी सामाजिक क्रांति के विचार मे आपस मे कोई तालमेल नहीं है। इनके बीच जनता मे अपनी कला के माध्यम से अपने विचार को पहुंचाने का कोई संगठित प्रयास नहीं चल रहा है। छोटे मोटे प्रयोग होते रहते हैं लेकिन वे तपती चट्टान पर बिखरी पानी की बूंदों की तरह अल्पजीवी होते हैं।
लेखक देश के जाने माने सामाजिक चिंतक हैं। लेख में व्यक्त विचार लेखक की निजी राय है।

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