गैर-बराबरी की संस्कृति को स्थापित करने में अहम भूमिका निभाते बहुजन

रजनीकान्त इन्द्रा| बाबा साहेब ने कहा हैं कि भारत का इतिहास कुछ और नहीं बल्कि दो संस्कृतियों (ब्राह्मणवाद /विषमवातावादी/ गैर-बराबरी और श्रमण/समतावादी) का द्वन्द हैं। यह सांस्कृतिक द्वन्द अनवरत चला आ रहा हैं। गैर-बराबरी की संस्कृति से पीड़ित देश की बहुजन आबादी अपने इतिहास का अध्ययन कर रहीं हैं, उसे पहचान रहीं परन्तु महत्वपूर्ण सवाल यह हैं कि इसके बावजूद बहुजन समाज इसकी पकड़ से बाहर क्यों नहीं निकल पा रहा हैं? हमारे विचार से इसके मुख्यतः तीन कारण हैं।

पहलाजागरूक बहुजनों का प्रतिक्रियावादी रवैया 

बहुजन समाज आज तक यह नहीं समझ पाया हैं कि उसकी लड़ाई किससे हैं? बहुजन समाज यह समझता हैं कि उसकी जंग इंसानों से हैं जबकि उसकी गुलामी का कारण गैर-बराबरी की विचारधारा व संस्कृति हैं। जैसे ही गैर-बराबरी की संस्कृति का कोई त्योहार आता हैं वैसे ही समतावादी विचारधारा व संस्कृति के लोग गैर-बराबरी की संस्कृति का पोस्टमॉर्टम करने लगते हैं, उसके खिलाफ लिखने लगते हैं।

गैर-बराबरी की संस्कृति के चतुर लोग बहुजन समाज की प्रवृत्ति से अच्छी तरह वाकिफ होते हैं। इसलिए वे भी अपनी संस्कृति के पक्ष में थोड़ी सी सफाई प्रस्तुत कर समतावादी संस्कृति के चाहनों वाले परन्तु प्रतिक्रियावादी लोगों को आकर्षित कर लेते हैं। जैसा कि आप सोशल मिडिया पर देख सकते हैं कि समतावादी लोग अक्सर गैर-बराबरी की संस्कृति की पोल खोलते ही रहते हैं। और यदि ये कभी मंद भी पड़ते हैं तो विषमतावादी संस्कृति के लोग खुद विमर्श छेड़ देते हैं। यहीं नहीं, चर्चा इस कदर छेड़ दी जाती हैं कि विषमतावादी संस्कृति का आदी हो चुका बहुजन समाज का एक बड़ा हिस्सा खुद बहुजन समाज के समतावादी लोगों के खिलाफ खड़ा हो जाता हैं।

नतीजा, एक बड़ा विमर्श छिड़ जाता हैं, चर्चा छिड़ जाती हैं जिसके केन्द्र में गैर-बराबरी की संस्कृति होती हैं, इसके त्योहार होते हैं, विचारधारा होती हैं, इसके नायक-नायिकाएं होती हैं। ऐसे में बहुजन समाज के लोगों को सोचने की जरूरत हैं कि इस पूरे चर्चा व विमर्श में बुद्ध-फुले-शाहू-अम्बेडकर की समतावादी संस्कृति, इसकी विचारधारा और इसके नायक और नायिकाएं व उनके सन्देश कहाँ हैं? यदि आपके विमर्श व चर्चा के केंद्र में आपके नायक-नायिकाएं, आपकी संस्कृति व पर्व आदि नहीं हैं तो आपकी ऊर्जा और समय आपके अंदर गैर-बराबरी की संस्कृति के प्रति पल रहे गुस्से को थोड़ी शांति जरूर दे सकती हैं परन्तु बढ़ावा गैर-बराबरी की संस्कृति को ही मिलेगा क्योकि “जो दिखता हैं वही बिकता है”।

दूसराविचारधारा  संस्कृति के बजाय इंसानों से लड़ना 

इतिहास के नकारात्मक तथ्य भी समाज को जागरूक करने के लिए आवश्यक हैं परन्तु इन नकारात्मक तथ्यों का इतना प्रचार भी ना किया जाय कि आपकी खुद की सकारात्मक विचारधारा व संस्कृति ही दफ़न होने लगे। दुखद हैं कि बहुजन समाज को बुद्ध-फुले-शाहू-अम्बेडकरी विचारधारा से जोड़ने के बजाय बहुजन समाज के रजिस्टर्ड संगठनों व जागरूक लोगों द्वारा बहुजन समाज को जागरूक करने के नाम पर गैर-बराबरी की संस्कृति के लोगों के प्रति नफ़रत करना, लड़ना सिखाया जा रहा हैं।

ये गम्भीरतापपूर्वक सोचने का विषय हैं कि आये दिन सोशल मिडिया पर, पत्रिकाओं में, बहुजन नायकों के जन्मोत्सव पर, ऐतिहासिक बहुजन पर्वों पर बहुजन समाज के लोग नकारात्मक ही सहीं लेकिन प्रचार किसका करते हैं? ये लोग भूलते जा रहे हैं कि निंदा से इंसानों को मारा जा सकता हैं परन्तु विचारधारा व संस्कृति को नहीं। किसी भी विचारधारा, संस्कृति पर जितनी चर्चा होगी, विमर्श होगा वो उतनी ही मजबूती से जड़ जमाती जाएगी। यही कारण हैं कि गैर-बराबरी की संस्कृति के पैरोकारों ने समतावादी बुद्ध-रैदास-फुले-अम्बेडकर की वैचारिकी, संघर्ष, गौरवगाथाओं व इतिहास को किताबों, सेमिनारों, शोधपत्रों से दूर कर दिया परिणामस्वरूप भारत में समतावादी संस्कृति कमजोर पड़ने लगी थी परन्तु मान्यवर साहेब और भारत महानायिका बहन जी के संघर्षों की वजह आज समतावादी संस्कृति, विचार, नायक-नायिकाएं आदि उस राजनीति का हिस्सा हैं जो सामाजिक सांस्कृतिक शैक्षिणिक आदि पहलुओं को प्रभावित करती हैं। इसलिए यदि विषमतावादी विचारधारा को नष्ट करना हैं तो उसको चर्चा के केंद्र से हटाना होगा, विमर्श से दूर करना होगा।मण्डल मसीहा मान्यवर साहेब कहते हैं कि “नकारात्मक प्रचार भी एक प्रचार होता हैं” मतलब कि यदि बहुजन समाज को लगता हैं कि आये दिन विषमतावादी संस्कृति को कोस कर वे बहुजन आन्दोलन को आगे ले जा रहे हैं तो ये उनका भ्रम मात्र हैं।

तीसराबहुजन समाज द्वारा अपने एजेण्डे पर काम ना करना 

बहुजन समाज के लोग अपने समय व ऊर्जा का अधिकांश समय अपने विरोधी संस्कृति की निंदा में बिताते हैं जिसके चलते ये खुद क्या चाहते हैं, इनकी संस्कृति और विचारधारा क्या हैं हैं, इनके नायक-नायिकाएं कौन हैं, उन्होंने किस तरह का समाज चाहा था, उनके सन्देश क्या हैं, आदि मुद्दों पर बहुजन समाज समय ही नहीं दे पता हैं। बहुजन समाज के लोग मौजूदा समय में सोशल मिडिया और पत्रपत्रिकाओं टीवी चैनल, सेमिनार और सभाओं में गैर-बराबरी की संस्कृति की निरन्तर निन्दा करने वाले लोगों को ही अपना आदर्श मानने लगे हैं जबकि इससे ना तो आपकी समतावादी संस्कृति पर चर्चा होती, ना आपकी समतावादी विचारधारा पर बहस होती हैं और ना ही आपके नायक-नायिकाएं और उनके सन्देश विमर्श के केंद्र में होते हैं। और इस तरह से बहुजन समाज के लोग खुद ही गैर-बराबरी की संस्कृति, विचारधारा, इसके त्यौहार, नायको-नायिकाओं की लगातार निन्दा करते हुए इनकों हाशिये के बजाय चर्चा व विमर्श के केन्द्र में स्थापित कर इनकी जड़ों को लगातार मजबूत करने का कार्य कर रहे हैं।

बहुजन समाज यदि विषमतावादी संस्कृति को नष्ट करके समतावादी संस्कृति के आधार पर समतामूलक समाज बनाना चाहता है तो उसे विषमतावादी संस्कृति को अलग-धलग छोड़कर उसके समान्तर अपनी समतावादी संस्कृति, अपनी समतावादी विचाधारा और इसके समतावादी महानायकों-महनायिकाओं जैसे बुद्ध, रैदास, कबीर, फुले, शाहू, आंबेडकर, काशीराम, और बहन जी आदि को को चर्चा, विमर्श के केंद्र में रखना होगा और गैर-बराबरी की संस्कृति व उसकी विचारधारा आदि को हाशिये पर।

यकीनन  “जितनी ऊर्जा, समय और संसाधन का दुरूपयोग समाज गैर-बराबरी की संस्कृति, विचारधारा, उनके त्यौहार और उनके नायकों-नायिकाओं को कोसने और उसकी निन्दा करने में करता हैं यदि वही समय, ऊर्जा और संसाधन का उपयोग बहुजन समाज समतावादी संस्कृति, विचारधारा, पर्व और समतावादी नायकों जैसे बुद्ध, रैदास, अशोक, घासीदास, नानक, नारायणा गुरु, पेरियार, फुले, शाहू, अम्बेडकर काशीराम और बहन जी की विचारधारा फ़ैलाने में करे तो शीघ्र ही हम समता स्वतंत्रता बंधुत्व पर आधारित बाबा साहेब के सपनों का भारत बना सकते हैं”।

याद रहें, मान्यवर साहेब कहते हैं कि किसी लाइन (विषमतावादी) को छोटी (नष्ट) करने के लिए उसे मिटाने (निंदा) की जरूरत नहीं हैं बल्कि उसके समानांतर अपनी (समतावादी) बड़ी लाइन खींचने की जरूरत हैं।

लेखक प्रसिद्ध बहुजन चिंतक हैं। लेख में व्यक्त विचार लेखक की निजी राय है।

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