डॉ. अंबेडकर जयंती और सैफई नेता अखिलेश यादव की ‘दलित दिवाली’

दीपांकर राव| विशेषकर मुझे श्री अखिलेश यादव के 14 अप्रैल यानी ‘अंबेडकर जयंती’ को ‘दलित दिवाली’ के रुप में मनाए जाने वाली ट्विटर टिप्पणी पर कोई आश्चर्य नहीं है । सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना से ‘शून्य’ इस यादव कुनबे से मुझे वैसे भी कोई उम्मीद नहीं है और न ही हमारे ‘दलित समाज’ को होनी चाहिए । दलित समाज को इस ‘कुनबे’ विशेष के नेताओं से सावधान रहने की जरूरत है । इनके यहां दलित समाज का न कभी भला हुआ है और न आगे होगा ।

श्री अखिलेश यादव के द्वारा जिस तरह से “अंबेडकर जयंती” जैसे “भारतीय लोकतंत्र के राष्ट्रीय पर्व” को “एक समुदाय विशेष का पर्व” बनाकर उस समाज के “राजनीतिक दोहन” की जो शर्मनाक कोशिश की गई है उसकी जितनी निंदा की जाये कम है । इससे घटिया और सामाजिक पिछड़ेपन की अन्य कोई दूसरी मिशाल नहीं हो सकती है ।

सपा के नासमझ छुटभैये नेता जिसमें कुछ दलित समाज के भी हैं जिस तरह से अखिलेश यादव के बचाव में उतरकर सफाई में अनर्गल दलीलें दे रहे हैं वह तो और भी घटिया है । उनका बेशर्मी से यह कहना कि “दलित तो पिछ़डा भी होता है” दरअसल उनकी सैद्धांतिक सामाजिक समझ की शून्यता भर है और कुछ नहीं । उनको और उनके नेता श्री अखिलेश यादव को एक बात मैं साफ-साफ बता देना चाहता हूं कि दलित समाज का सामाजिक अर्थ होता है – ‘वह समाज जो हिंदू धर्म की वर्णव्यवस्था से बाहर गिना जाता रहा है और सर्वसमाज में अस्पृश्य (जिनको छूना भी पाप होता था) होने का भुक्त-भोगी रहा है । उसे ही हमारे समाज, राजनीति और साहित्य में “दलित” कहा गया है । दलित समाज की यही सर्वमान्य परिभाषा है।’ शोषित और उत्पीड़ित तो आज समाज का लगभग हर वर्ग है मगर वह कैसे भी ‘दलित समाज’ की श्रेणी में नहीं आ सकता है। बस आप सीधा-सीधा इतना समझिए कि जो इतिहास में “अस्पृश्य” नहीं रहा है उसे “दलित” नहीं कहा जा सकता है। दलित होने की पहली शर्त ही है ‘अस्पृश्य’ होना। अगर आप उसमें पिछड़ों को भी जोड़ना चाहते हैं तो उसे “दलित-बहुजन” की संज्ञा दी जा सकती है। मान्यवर कांशीराम साहब ने देश के 85% शोषित समाज को इसीलिए “दलित बहुजन” माना है। लेकिन आपको जब “बहुजन समाज” की संज्ञा से ही परहेज है तो उसका क्या ही किया जा सकता है।

अब केवल छुटभैये समाजवादी नगाड़ियों के द्वारा अखिलेश यादव की तरफ से सफाई और उनके बचाव में सिर्फ झूठ और अनर्गल व्याख्या ही की जा रही है या समझिए कि एक ने गोबर कर दिया है तो बाकी उसे लीपकर सुंदर बनाने की नाकाम कोशिश करने में लग गये हैं। बाकी श्री अखिलेश यादव का मूल उद्देश्य तो बाबा साहब डॉ. अंबेडकर को केवल दलित और दलितों का नेता मानकर ही उनके माध्यम से दलित समाज को गुमराह करना है बस और कुछ नहीं । जिसमें औंधे मुंह गिरने के अलावा समाजवादियों को कुछ भी हासिल नहीं हुआ है और न आगे होगा। समाजवादियों के मानस पटल पर डॉ. अंबेडकर और दलित समाज के लिए कितनी जगह और इज्जत है यह हम सबसे छिपा नहीं है। इनके लिए समाजवादी नेता सर्वसमाज के लिए “जननायक” तक बने बैठे हैं लेकिन डॉ. अंबेडकर केवल दलित नेता ही हैं। इसलिए उनके नाम पर केवल “दलित दिवाली” ही मनाई जा सकती है लोकतंत्र का कोई “राष्ट्रीय उत्सव” नहीं। क्योंकि ऐसा करने से सवर्ण वोट बैंक नाराज हो सकता है । इसलिए समाजवादी यह जोख़िम उठाने के लिए तैयार नहीं हैं और इसलिए समाजवादी इस रणनीति पर चलें हैं कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। मतलब दलित वोट बैंक को भुना भी लिया जाए और सवर्ण वोट बैंक नाराज भी न हो ।

डॉ. अंबेडकर इनके लिए केवल अवसर मात्र हैं और कुछ नहीं। जिनको सीढ़ी बनाकर सत्ता के गलियारों तक आराम से पहुंचा जा सकता है बस । इन बौड़म नेताओं के दिमाग में ‘दलित दिवाली’ नामकरण न जाने किस सोच की उपज है जिसमें वे अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार बैठे हैं। ‘दलित’ कहकर एक तो आपने डॉ. अंबेडकर को जातिगत राजनीति से बांध दिया और ‘दिवाली’ कहकर एक पूरी ‘युग चेतना’ पर आपने हिंदूवादी रंग चढ़ाने की शर्मनाक कोशिश की। जबकि डॉ. अंबेडकर की सामाजिक और राजनीतिक हैसियत इन दोनों संकीर्णताओं से ऊपर है। बौद्ध धर्म अपना चुके बाबा साहब का यह कैसा राजनीतीकरण कर रही है समाजवादी पार्टी? हिंदू व्यवस्था और उसके उत्सव नकार चुके डॉ. अंबेडकर का ऐसा विवेकहीन दोहन करने वाला यह ‘यादव कुनबा’ और कितना गिरेगा ?

मैं उस दिन को याद कर रहा हूं जब भाजपा शासन की उत्तर प्रदेश में ताजपोशी हुई थी और पूरा मुख्यमंत्री कार्यालय गंगाजल से धुलवाया गया था। क्योंकि उनकी नज़र में इसके पहले उस कुर्सी पर बैठने वाले दलित (मायावती) और पिछड़े (अखिलेश यादव) शूद्र और अछूत समाज से आते थे। अखिलेश यादव की इस घटना पर तब की रुहांसी प्रतिक्रिया देखकर लगा कि सवर्णों की ठकुरसुहाती करने का इतना अपमानजनक फल भुगतने के बाद अखिलेश यादव को सामाजिक न्याय और बहुजन कल्याण की तरफ ध्यान देने की सुध जरुर पैदा होगी और वह बहुजन समाज के प्रति अब कुछ ठोस कदम उठाने के लिए प्रेरित होंगे, मगर “कुकुरे कै मार अढ़ाई लबेदा” जैसी पूर्वांचली कहावत बस चरितार्थ हो कर रह गई ।

आज भी दलित बस्तियों के लोग ब्राह्मण और ठाकुरों के बाद सबसे ज्यादा जातिवादी यादवों के दैनिक उदंडता से रोज ही दो-चार होते रहते हैं। हमें यह उम्मीद थी की इस ‘गंगाजल छिड़काव’ वाली घटना के बाद अखिलेश यादव जरुर दलितों की सुरक्षा और बहुजन समाज को नये सिरे से जोड़ने के लिए कोई ज़मीनी मुहिम चलाएंगे जिससे इस तरह की घटनाओं पर लगाम लगेगी। मगर यादव कुनबे का कुल किया-धरा केवल “ढ़ाक के तीन पात ” ही रह गए ।

अगर आपने डॉ. अंबेडकर से सामाजिक परिवर्तन का गुर ही नहीं सीखा और बहुजन समाज को जोड़ने की सैद्धांतिक शिक्षा ही नहीं ली तो उनके नाम पर यह “दलित दिवाली” मनाने का राजनैतिक “नक्कार-खाना” आखिर क्यूं खोल रखा है ।

आप अगर सच में और साफ मन से अंबेडकर जयंती मनाना चाहते हैं तो सबसे पहले दलितों और पिछड़ों के बीच की सामाजिक खाई को पाटने के लिए ठोस और ज़मीनी मुहिम चलाइए। उत्तर प्रदेश के हर जिले में लाइब्रेरी और छात्रावास खोलने का प्रण लीजिए जिसमें वंचित समाज का हर बच्चा आराम से पढ़ लिख सके। अपने समाजवादी नेताओं से कहिए कि डॉ. अंबेडकर के नाम पर महाविद्यालय और विश्व विद्यालय खोलें और उसमें छात्रों को संविधान, लोकतंत्र और बहुजन महापुरुषों के संघर्ष और शिक्षाओं को आत्मसात करने के लिए प्रेरित करें। बहुजन समाज में वैज्ञानिक सोच का संचार करिए और यह सुनिश्चित करिए कि बहुजन समाज का कोई भी बच्चा आर्थिक और सामाजिक दिक्कतों की वजह से अपनी पढ़ाई-लिखाई अधूरी न छोड़ दे। दरअसल यही सब करके आप “अंबेडकर जयंती” को सफल और सुफल बना सकते हैं। लेकिन मैं जानता हूं आप ऐसा नहीं करेंगे । क्योंकि आपको सिर्फ वोट बैंक तक ही बात समझ में आती है आगे की नहीं। आपको सामाजिक चेतना के नाम पर पैतृक विरासत में ही सिवाय जातीय जोड़-तोड़ के और कुछ नहीं मिला है। मगर सामाजिक विरासत के रूप में मा. लल्लई सिंह यादव जैसे चेतना संपन्न व्यक्ति के पास बहुत कुछ है, कम से कम उन्ही की सामाजिक चेतना की थोड़ी लाज रख लीजिए तो वही हम सब के लिए बहुत बड़ी बात होगी ।

श्री अखिलेश यादव को अगर इतनी भी सामाजिक संरचनाओं की समझ नहीं है तो उन्हें कम से कम डॉ. अंबेडकर के लिखत का ही थोड़ा अध्ययन करना चाहिए । अगर वह इतना भी नहीं कर सकते हैं तो मेरी सलाह है कि वह रोज “बामसेफ” जैसे संगठन में जाकर ‘सामाजिक चेतना’ के कुछ पाठ पढ़ सकते हैं । मान्यवर साहब ने बामसेफ जैसे संगठन का निर्माण ही इसीलिए किया था कि उसके माध्यम से दलितों और पिछड़ो को सामाजिक और राजनीतिक चेतना का ‘ककहरा’ समझाया जा सके । ताकि आगे चलकर वह नेता बने किसी वर्ग विशेष का “चमचा” नहीं ।

बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर ने शूद्रों को दो श्रेणियों में बंटे होने की संकल्पना की थी । पहला “सछूत शूद्र” और दूसरा “अछूत शूद्र” । बाद में उन्होंने “अछूत शूद्रों” को ही “डिप्रेस्ड क्लास” और “बहिष्कृत समाज” कहा था और केवल इन्ही के लिए गोलमेज सम्मेलन सन् 1932 ई. में ‘पृथक निर्वाचन मंडल’ की मांग की थी । आजादी के बाद इन शब्दों का हिन्दी अनुवाद “दलित वर्ग” के रूप में हुआ है और उसे राजनीति में उनके प्रतिनिधित्व के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा । सबसे पहले महाराष्ट्र के मराठी साहित्य और राजनीति में इस “दलित” शब्द का प्रयोग और प्रचलन 1960 ई. के बाद शुरू हुआ फिर यह धीरे-धीरे अपने हिंदी पट्टी में आया ।

सपा के एक छुटभैये नेता जो दलित समाज से ही हैं और पेशे से वकील भी हैं उनका आज एक व्हाट्स अप मैसेज प्राप्त हुआ। जो अखिलेश यादव की इस शर्मनाक टिप्पणी को दरअसल “डिफेंड” करने के लिए लिखा गया था। जब मैंने उसे पढ़ा तो उसकी दलित शब्द की बेसिक समझ पर मुझे बड़ी हैरत हुई और हंसी भी छूट पड़ी । उसमें उन्होंने लिखा था -” भारतीय समाज में ‘दलित’ शब्द का एक बड़ा राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास रहा है।” आपकी यह कैसी समझ बन गई है भाई? राजनैतिक इतिहास कहना तो कुछ हद तक ठीक भी है मगर ‘सामाजिक और सांस्कृतिक’ इतिहास रहा है , यह कहना भला यह कैसे ठीक हो सकता है ? इस बात को पढ़कर तो मैंने माथा पकड़ लिया और सोचने लगा कि बताइए “दलित” होना भी सपा की राजनीतिक शब्दावली में सामाजिक और सांस्कृतिक उत्थान और गौरव की बात है । क्योंकि अब तक तो मैंने यही पढ़ा और पाया है कि सामाजिक और सांस्कृतिक विशेषताएं किसी समाज के द्वारा हजारों वर्षों से संचित ‘जीवन दर्शन’ का प्रारुप होती हैं । तब “दलित होने ” को सांस्कृतिक विशेषता या इतिहास से जुड़ा होना कैसे माना जा सकता है जबकि यह केवल परिस्थिति-जन्य शब्द है न कि संस्कृति-जन्य है। जब सामाजिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक विरासत के बीच अंतर की समझ इन ‘बौड़म’ नेताओं को नहीं है तो इनसे क्या ही उम्मीद की जा सकती है । यह तो सामाजिक चेतना का ही गुड़ गोबर करने पर तुले हुए हैं ।

सामाजिक चेतना से शून्य इस ‘यादव कुनबे’ को तो इतना भी नहीं पता कि जब डॉ. अंबेडकर जैसे राष्ट्रीय नेता समाज के एक विशेष वर्ग को डिप्रेस्ड, शोषित, बहिष्कृत और दलित कह रहे थें तो वह दरअसल उस समाज की “दयनीय और अमानवीय परिस्थिति” को ही बता रहे थे, न कि उसकी सांस्कृतिक विरासत का गुणगान कर रहे थे । किसी समाज का ‘दलित होना’ उस राष्ट्र के लिए गर्व की नहीं बल्कि शर्म की बात होती है । दलित शब्द साहित्य और राजनीति में केवल इसलिए प्रचलन में है कि इस शब्द के माध्यम से उस समाज की अभिव्यक्तियों और सामाजिक आकांक्षाओं को तरजीह मिल सके और वह तथाकथित सभ्य समाज के लिए आईना बन सकें, जिसमें समाज की व्यवहारिक विद्रूपताओं को दिखाया और स्पष्ट रूप से साहित्य में दर्ज किया जा सके । जो इस समाज की दयनीय हालत के लिए वास्तविक जिम्मेदार हैं ।

अब आप लोग सोच रहे होंगे कि सैफई का यह ‘यादव कुनबा’ 14 अप्रैल को “दलित दिवाली” घोषित करके आखिर क्या हासिल करना चाह रहा था? तो मैं बताता हूं कि क्या हासिल करने का उद्देश्य रचा गया है इन तथाकथित समाजवादियों के द्वारा।

अब कुल मामला दरअसल “हासिल” करने का ही है और वह “हासिल” है दलित वोट बैंक । उत्तर प्रदेश का विधान सभा चुनाव नजदीक है ऐसे में दलित वोटों को भुनाना सपा के लिए एक बड़ी राजनीतिक मजबूरी है । जिसके लिए वह हमारे राष्ट्रीय नेता डॉ. अंबेडकर को भी इस्तेमाल करने से नहीं चूक रहे हैं ।

अब आप आगे समझिए कि “दलित दिवाली” को समाजवादी पार्टी किस रुप में मनाना चाह रही है । आगे उसकी भी बानगी है देखिए । उस मैसेज में लिखा है – “समाजवादी पार्टी द्वारा “14 अप्रैल अम्बेडकर जयंती” को “दलित दिवाली” का आह्वान किया गया है। राष्ट्रीय अध्यक्ष समाजवादी पार्टी माननीय अखिलेश यादव जी के इस ऐतिहासिक फैसले का हम तहे दिल से इस्तेकबाल करते हैं। और आप सभी साथियों से अपील करते हैं कि इस अम्बेडकर प्रकाश पर्व को हर्षोल्लास के साथ मनाए। जिससे भाजपा रूपी अंधकार अमावस्या से हमें निजात मिल सके और समाजवादी प्रकाश का आगाज हो सके। “

मतलब अब “अंबेडकर जयंती” एक महापुरुष के योगदानों को याद करने और उनके द्वारा लक्षित समाज कल्याण को पूरा करने का प्रण लेना नहीं रह गया है । अब यह राजनीतिक नूरा-कुश्ती का साधन बन गया है । जिसे हर राजनीतिक पार्टी एक दूसरे के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल करना चाहती है । अब सोचिए कि क्या हमारे देश के दलित समाज में रोजी-रोटी, नौकरी, शिक्षा, सुरक्षा , स्वास्थ्य और समुचित अवसरों के न मिलने का अंधकार नहीं है क्या ? उसे कब दूर किया जाएगा ? या उसे दूर करने के लिए कितने अथक प्रयास समाजवादी ‘यादव कुनबे’ ने अब तक किया है ? कुल मिलाकर समाजवादियों ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पर छाये अंधकार को मिटाने के लिए दलित वोट बैंक को साधने का षड़यंत्र रचा है बस । इसमें न केवल हमारे महापुरुष डॉ. अंबेडकर का अपमान किया गया है बल्कि यह पूरे दलित समाज का अपमान है । इसे ही हम आजकल “घटिया राजनीतिक अवसरवाद” कहते हैं । जो समाज के महापुरुषों की गरिमा को भी चूल्हे-भाड़ में झोंक देने के लिए तैयार रहता है ।

अब आप पलट कर सैफई के इस यादव कुनबे और श्री अखिलेश यादव से पूछिए कि जब ‘भाजपा रुपी अमावस्या का अंधकार’ नहीं था और आप पूर्ण बहुमत के प्रचंड प्रकाश में जब सत्ता के तख्त पर बैठे थे, तब आपने दलित समाज के जीवन में फैले अंधकार को कितना दूर किया? तो आपको जवाब में कुछ नहीं मिलेगा । दरअसल समाजवादियों का यह ‘कुनबा’ दलित समाज के विरोध की नींव पर ही खड़ा रहा है । सवर्ण वोट बैंक की ठकुरसुहाती में इस ‘यादव कुनबे’ ने दलित समाज का जितना नुकसान किया है उतना ‘वंचित समाज’ से आने वाली शायद ही किसी राजनीतिक पार्टी ने किया होगा ।

इस कुनबे का कुल इतिहास ही यही रहा है कि इसे सत्ता की महत्वाकांक्षा के आगे कभी भी दलित समाज का हित न दिखाई पड़ा है और न सुनाई पड़ा है । इस कुनबे के तथाकथित समाजवादियों ने केवल “सत्ता” हथियाने के लिए किस हद तक दलित समाज के खिलाफ जा कर काम किया है उसे निम्न उदाहरणों से आप समझ सकते हैं-
1. इस ‘यादव कुनबे’ ने दलित समाज से आने वाली पहली और एकमात्र महिला मुख्यमंत्री सुश्री मायावती पर ‘लखनऊ गेस्ट हाउस’ में जानलेवा हमला किया और उनकी आबरू लूटने की शर्मनाक कोशिश की । वह भी केवल इसलिए कि उनके शासनकाल में दलित समाज ‘असुरक्षित’ हो गया था । ठाकुर और यादव ज़मात का हिंसक प्रकोप दलित समाज आए दिन झेल रहा था। और यह सब देखकर सुश्री मायावती ने गठबंधन की सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था ।

2. इस ‘यादव कुनबे’ के युवराज ने अपने तमाम चट्टी-चौराहों की सभाओं में एकमात्र दलित महिला मुख्यमंत्री सुश्री मायावती को “बहन जी” संबोधित करने की बजाय “बुआ- बुआ” कहकर हर जगह उनका मजाक बनाया है ।

3. इस ‘यादव कुनबे’ ने अपने दलित सांसद “यशवीर सिंह” के हाथों सरकारी नौकरियों में मिलने वाले एससी/एसटी प्रमोशन में आरक्षण के बिल को फड़वाया है और उस बिल का खुलकर विरोध भी किया है और उसे पास नहीं होने दिया । ताकि दलित समाज को सरकारी नौकरियों में पदोन्नति पाने से रोका जा सके ।

4. इस ‘यादव कुनबे’ ने केवल 10% सवर्णों की नाराज़गी के डर से 85% बहुजनों को मिलने वाले लोकसेवा आयोग में त्रिस्तरीय आरक्षण अधिनियम को लागू नहीं होने दिया ।

5. इस कुनबे ने अपने बनाये “सिद्धार्थ विश्वविद्यालय” में होने वाली शिक्षकीय नियुक्तियों में दलितों और पिछड़ों का आरक्षण लागू नहीं होने दिया और न ही उनकी नियुक्ति होने दी। उस विश्वविद्यालय के लगभग हर विभाग में केवल सवर्ण ही की नियुक्ति पा सके । और यह खेल समाजवादियों ने बहुजन विरोधी 13 प्वाइंट रोस्टर को आधार बनाकर किया। जिसके खिलाफ हम दिल्ली विश्वविद्यालय में साल भर संघर्ष करते रहे।

क्या अब भी आपको लगता है कि यह “दलित दिवाली” मनाने की नासमझ भरी राजनीतिक नौटंकी दलित वोट बैंक बटोरने का हथकंडा भर नहीं है ?? ऐसे ‘यादव कुनबे’ के नेता “दलित समाज” का कितना भला कर सकते हैं इस पर आप सबको पुनर्विचार करना चाहिए । इनके चेतना शून्य मानसिक दिवालियेपन पर थोड़ा ठहरकर सोचेंगे तो सब कुछ साफ हो जाएगा ।

लेखक जाने माने युवा चिंतक हैं। लेख में व्यक्त विचार पूर्णतया लेखक की निजी राय है।

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