दिल में दर्द हज़ार अगर तो क्या करिए

दिल में दर्द हज़ार अगर तो क्या करिए

दिल में दर्द हज़ार अगर तो क्या करिए !
ज़ुल्मी हो सरकार अगर तो क्या करिए !!

खैनी , बीड़ी , पान , तंबाकू , दारू में
बिक जाए घर बार अगर तो क्या करिए !

पानी खेतों को तो अब तक मिला नहीं
तन पर हो बौछार अगर तो क्या करिए !

नहीं मयस्सर दोनों साँझ की रोटी भी
उसपर माँ बीमार अगर तो क्या करिए !

जिस नाविक को पार लगानी थी नौका
वही पड़ा मझधार अगर तो क्या करिए !

विजय-कामना जिसकी खातिर तुमने की
मिले उसी से हार अगर तो क्या करिए !

जिसकी खातिर तुम दुनिया से भिड़ जाओ
वह तुमसे बेज़ार अगर तो क्या करिए !

कल तक जिसमें प्रेम की गंगा बहती थी
उस घर में तकरार अगर तो क्या करिए !

दुनिया को बाज़ार बनाया हमने ही
रिश्ते हैं व्यापार अगर तो क्या करिए !

स्वर्ग – नरक के झूठे दावे सच लागें
भ्रम लागे संसार अगर तो क्या करिए !

-देवेन्द्र

देवेन्द्र कुमार चौबे, पी. के. रॉय मेमोरियल कॉलेज, धनबाद मे हिंदी के प्राध्यापक हैं एवं प्रसिद्ध कवि हैं l

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