बेवजह नहीं है किसानों का विरोध, भारत में खतरा स्पष्ट और प्रत्यक्ष है

एक तरफ जहाँ देश के किसान केंद्र के कृषि कानूनों के विरोध में अपनी मांगों के साथ हफ्ते भर से अधिक समय से सड़कों पर जमे हुए हैं वहीं कॉर्पोरेट संचालित मीडिया सरकार के बचाव में रात दिन एक किये हुए है। वह इस आंदोलन को खालिस्तानियों द्वारा समर्थित, अर्बन नक्सलियों द्वारा प्रायोजित, राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित, देश की सुरक्षा के लिए खतरा आदि न जाने क्या क्या घोषित करने पर तुला हुआ है। मगर असल मुद्दे की बात कुछ एक मीडिया घरानों या चंद पत्रकारों के अलावा कोई नहीं कर रहा। जबकि कायदे से इस विषय की गंभीरता को देखते हुए पुरे देश को किसानों का पक्ष जानना चाहिए क्योंकि केंद्र के कृषि कानूनों से सिर्फ किसान ही नहीं बल्कि इस देश का हर नागरिक प्रभावित होने वाला है। इस आलेख में हमने बड़े ही सीधे और सरल शब्दों में किसान आंदोलन से जुड़े मुद्दों को रखने की कोशिश की है।

भारत में मौजूदा किसान आंदोलन मुख्य रूप से चार विषयों को लेकर है।
1. किसानों की मांग है कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसल खरीद की क़ानूनी गारंटी दे, जिसे सरकार ने अपने नए कृषि कानूनों में नहीं शामिल किया है।
2. किसानों की मांग है कि सरकार के नए कृषि कानूनों के तहत जिन प्राइवेट मंडियों की स्थापना होनी है उन पर भी सरकारी मंडियों की तरह ही टैक्स लगाया जाये। अन्यथा अलाभकारी होने के कारण सरकारी मंडियाँ समाप्त हो जाएँगी और किसान अपनी फसलों को बेचने के लिए पूर्णतया कॉर्पोरेट संचालित निजी मंडियों पर निर्भर हो जायेंगे।
3. किसानों का आरोप है कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से जुड़े नए कृषि कानून में उनके लिए अदालतों के दरवाजे बंद कर दिए गए हैं, जिससे उनके साथ किसी तरह की नाइंसाफी होने पर वह न्याय के लिए गुहार नहीं लगा सकेंगे।
4. किसानों को डर है कि नए कृषि कानून में अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, आलू, प्याज आदि को आवश्यक वस्तुओं की सूची से हटाने से बड़े उद्योगपति इनका भण्डारण कर लेंगे और उन्हें मनमाने तरीके से कीमत निर्धारण की शक्ति प्राप्त हो जाएगी।

यह चारों मुद्दें निश्चित ही अत्यंत विचारणीय हैं जिनके बारे में देश के हर संवेदनशील व्यक्ति को सोचना होगा। इस देश का किसान सबसे अधिक सहनशील और उदार व्यक्ति है। सर्दी-गर्मी, दिन-रात, बारिश-धुप हर सम-विषम परिस्थिति में खेतों में डटे रहकर देश का पेट भरने के बावजूद उसने कभी भी कोई अनुचित मांग नहीं रखी है। सरकार अगर कह रही है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था जारी रहेगी तो उसे यही बात कानून में शामिल करने में आखिर क्या समस्या है? कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को लेकर आखिर सरकार न्यायालयों की अधिकारिता क्यों नहीं चाहती? प्राइवेट मंडियों, निजी निवेश और किसानों को फसलों की अधिक कीमत को लेकर बिहार में ठीक केंद्र के नए कृषि कानूनों की तरह ही व्यवस्था 2006 से है, फिर वहाँ के किसान बेहाल और बदहाल क्यों हैं? इसी तरह व्यक्ति की रोजाना जरुरत से जुड़ी वस्तुओं अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, आलू-प्याज को लेकर भी किसानों के डर को बेवजह नहीं कहा जा सकता। हमने यह देखा है कि कैसे नयी फसल के आने के समय अचानक से दाम कम कर दिए जाते हैं और किसानों से फसल लेने के बाद उसे मनमाने दर पर बाजार में बेचा जाता है। कुल मिलकर मामला वह नहीं है जो कॉर्पोरेट मीडिया दिखा रहा है या दिखाना चाहता है। देश को किसान आंदोलन के पीछे की वास्तविक वजहों को जानना होगा। एक बार अगर हमने आपने चीजों को सही परिप्रेक्ष्य में देख लिया तो यकीन मानिये इस पुरे प्रकरण में हमें अपना पक्ष चुनने में कोई दुविधा नहीं होगी।

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