भारतीय महिलाओं के मुक्तिदाता ‘बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर’

सोनी कुमारी | डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जिन्हें प्यार और सम्मान से बाबा साहब भी कहा जाता है माँ भारती के उन यशस्वी सपूतों में से थे जिन्होंने सदियों से वंचना, तिरस्कार, भेदभाव और उत्पीड़न का दंश झेल रही हमारे देश में महिलाओं के जीवन में सार्थक और क्रांतिकारी बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज जब हम अपने देश में महिलाओं की स्थिति को देखते हैं तो एक बड़ी ही विरोधाभाषी स्थिति नजर आती है। एक तरफ जहाँ महिलाओं को शक्ति का स्वरुप अर्थात देवी माना जाता है वहीं दूसरी तरफ वही देवी अपनी इच्छा और स्वतंत्रता से सभी कामों को नहीं कर सकती है और आज भी पुरुषों पर निर्भर है। महिलाओं की स्थिति में सुधार हो रहा है लेकिन उतना नहीं जितना होना चाहिए। महिला सशक्तिकरण का अर्थ यह नहीं है कि उनको मैट्रिक, इंटर या ग्रेजुएट करा दिया और जॉब करने की आजादी दे दी जाये। हमें महिलाओं को पुरुष की तरह बराबरी में देखना होगा। हमें उन्हें अपने जीवन के बारे में स्वयं निर्णय करने की शक्ति देनी होगी। पर्याप्त संसाधनों पर महिलाओं का नियंत्रण स्थापित करना होगा ताकि वह स्वयं निर्णय ले सकें और दूसरों को निर्णय लेने में सहयोग कर सकें।

इतिहास के पन्नों में झांककर देखें तो हम पाते हैं कि भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति भिन्न भिन्न कालों में अलग अलग रही। पूर्व वैदिक काल में उनकी स्थिति बेहतर थी, उन्हें लगभग पुरुषों की तरह ही स्वतंत्रता एवं समानता का अधिकार था। लेकिन कालांतर में उनकी स्थिति में गिरावट आने लगी जो मुस्लिम आक्रमणकारियों के आगमन के बाद और भी बदतर हो गयी। बाबा साहब का मानना था कि महिलाएं चाहे सवर्ण हो या दलित दोनों सतायी जाती हैं| देश का यह कर्तव्य होना चाहिए कि हर वर्ग की महिलाओं को पुरुषों के बराबर स्वतंत्रता एवं अवसर प्रदान हो ताकि उनका सर्वांगीण विकास हो सके और देश के निर्माण में वह अपनी भूमिका निभा सके। बाबा साहब ने भारतीय प्रेस के इतिहास में पहली बार महिलाओं से जुड़े विषयों को पत्रकारिता का केंद्र बिंदु बनाकर अपने पत्र मूकनायक तथा बहिष्कृत भारत के माध्यम से छापना शुरू किया और महिलाओं से जुड़ी समस्याओं को उजागर करने का साहस प्रदर्शित किया। बाबा साहब ने महिला शिक्षा के साथ-साथ अनेक सामाजिक कुरीतियों जैसे बाल विवाह, बहुपति विवाह, देवदासी प्रथाओं को नकारने एवं रोकने की बात की जिससे महिलाओं के सम्मान में वृद्धि हो।

बाबा साहब ने 1938 में विधानसभा में परिवार नियोजन के उपायों की वकालत करते हुए महिलाओं द्वारा अधिक संतान पैदा करने के जोखिम पर चर्चा की थी जिसके पश्चात भारत में पहली बार स्त्रियों को अनचाहे गर्भ से मुक्ति का कानूनी अधिकार प्राप्त हुआ। आज हम मेटरनिटी लीव अर्थात मातृत्व अवकाश का लाभ लेते हैं यह भी बाबा साहेब की ही देन है। उन्होंने 1942 में कामकाजी महिलाओं हेतु मातृत्व लाभ विधेयक एवं समान काम समान वेतन जैसे प्रगतिशील विधेयकों को पास कराया। इतना ही नहीं गर्भवती महिलाओं को खदानों या जोखिमपूर्ण कार्यों में लगाने से मनाही का कानून भी बाबा साहेब की ही देन है। बाबा साहेब को दलितों का मसीहा मानने की प्रचलित धारणा से इतर अगर हम देखें तो बाबा साहेब भारतीय महिलाओं के सबसे बड़े मुक्तिदाता थे जिनके प्रयासों के कारण ही भारत में महिला अधिकारों का घोषणापत्र या मैग्नाकार्टा के नाम से प्रसिद्ध ‘हिन्दू कोड बिल’ आया जिसके जरिये महिलाओं को उत्तराधिकार, पिता की संपत्ति में पुत्र के समान अधिकार, दत्तक ग्रहण का अधिकार तथा तलाक का अधिकार जैसे वे अधिकार मिले जिन्हें सामाजिक धार्मिक विधानों ने उनसे छीन लिया था। इसी कानून के द्वारा देश में हिन्दू पुरुषों पर एक पत्नी के जीवित होते दूसरी शादी करने की पाबन्दी लगायी गयी।

आजादी के इतने साल बाद भी हम अपने जीवन में चारों तरफ अनेकों ऐसी घटनाओं को देखते हैं जिससे समझ आता है कि आज भी महिलाएं स्वतंत्रता एवं समानता का अधिकार पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं कर सकी हैं। मैंने स्वयं अपने जीवन में अपने आसपास आधी आबादी अर्थात महिलाओं के के साथ बुरा व्यवहार होते हुए देखा है। बच्चियों की मेट्रिक तो छोड़िए 8 वीं कक्षा में ही शादी करवा दी जाती है। आज भी दलित, पिछड़े एवं गरीब परिवार की बच्चियां शिक्षा से वंचित रह जाती हैं और उन्हें मजबूरीवश चुपचाप सब कुछ सहना पड़ता है। बाबा साहेब के विचारों को अगर इन परिवारों के द्वारा अपनाया गया होता तो आज शायद मैं यह बात कहने के लिए मजबूर नही होती।

बाबा साहब का सपना सिर्फ भाषण देने, रैलियां करने, दीप जलाने, उनकी मूर्ति बनवा देने से या उन्हें पूजने से पूरा नहीं हो सकता है। बाबा साहब का सपना तभी पूरा होगा जब हम उनकी बातों को अपने जीवन में उतारे और दूसरों को ऐसा करने के लिए प्रेरित करें। बाबा साहब की बातों को अगर हमारे आसपास के लोग स्वीकारते और अपनाते तो शायद आज महिलाओं की जो स्थिति है इससे बहुत बेहतर होती। जो परिवार, महिला या पुरुष बाबा साहब की बातों को अपना आदर्श मानकर आगे बढ़े हैं, उनका परिवार हर तरह से आगे बढ़ा है, चाहे उच्च शिक्षा के क्षेत्र में हो, सामाजिक न्याय के क्षेत्र में हो या महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में हो। ऐसे परिवार की बच्चियों ने उच्च शिक्षा प्राप्त की है एवं अच्छे पद पर भी आसीन है। आज हमें जरूरत है बाबा साहब के कर्मों को आदर्श मानकर अपने जीवन में उतारने की और उनके द्वारा चलाए गए आंदोलनों को एक बार पुनः शुरू करने की। यह न सिर्फ आधी के प्रति हमारी जिम्मेदारी है बल्कि सही मायनों में उस महामानव के प्रति हमारी श्रद्धांजलि भी होगी जिसने आधी आबादी को पूरा हक़ दिलाने के लिए आजीवन संघर्ष किया और उस महत्वपूर्ण बदलाव का मार्ग प्रशस्त किया जिसकी बदौलत आज इस देश की लाखों महिलाएं पूरी ताकत और विश्वास के साथ आगे बढ़ पा रही हैं।

लेखिका बिहार राज्य पंचायती राज विभाग अंतर्गत जिला सामाजिक विकास समन्वयक, गया के पद पर कार्यरत हैं।

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