ये तानाशाह

ये तानाशाह
संजय श्रमण

ये तानाशाह
हर उस अच्छी चीज को
जिंदा कर दे रहे हैं
जो खुशख्याली की धुंध मे
या वक्त की सलवटों मे
कहीं गुम हो गयी थी
आज़ादी का ख्याल
कहीं गुम हो गया था
इन्होंने गुलामी लादकर
उसे फिर भड़का दिया है
भाईचारे का कमाल
कहीं गुम हो गया था
इन्होंने नफ़रतें लादकर
उसे फिर भड़का दिया है
अमन का आमाल
कहीं गुम हो गया था
इन्होंने शोर बरपाकर
उसे फिर भड़का दिया है
इल्म का जलाल
कहीं गुम हो गया था
इन्होंने जहालत फैलाकर
उसे फिर भड़का दिया है
खुशख्याली की धुंध
और वक्त की सलवटें
अब टूट रहीं हैं
अब रास्ते रोशन हुए
मंजिले नजर आने लगीं
और ये सारे गुमशुदा
अब घर लौट रहे हैं…

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