सामाजिक परिवर्तन दिवस: एक अनोखी पहल

दीपशिखा इन्द्रा| स्वतंत्र भारत में लोकतंत्र की स्थापना के साथ ही देश के हर तबके को लोकतंत्र में हिस्सेदारी का प्रावधान संविधान में शामिल कर लिया गया। पृथक निर्वाचन का अधिकार गांधी द्वारा आमरण अनशन करके छीन लिए जाने के बाद, मतलब कि पूना पैक्ट के परिणामस्वरूप, देश के अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति को उनकी संख्या के अनुपात में लोकसभा व विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया। परंतु इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि इन सुरक्षित सीटों पर चुने जाने वाले अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लोग अपने समाज की नुमाइंदगी करने के बजाए मनुवादी राजनीतिक दलों के लिए मुखौटा बन कर रह गए। इस तरह से भारत में परतंत्र राजनीति का एक सिलसिला शुरू हो गया।

बाबा साहब के परिनिर्वाण के बाद भारत में वंचित जगत की गुलाम राजनीति को उसकी स्वतंत्र पहचान दिलाने व बाबा साहब के सपने को हकीकत की सरजमी पर उतारने के लिए मान्यवर कांशीराम साहेब और परम आदरणीया बहन जी ने एक मुहिम शुरू कर दी। इस मुहिम के तहत मान्यवर कांशीराम साहब ने बहुजन समाज को उसकी एक स्वतंत्र राजनीति स्थापित करने के लिए एक योजनाबद्ध तरीके से बहुजन आंदोलन की शुरुआत की। जिसके तहत सबसे पहले उन्होंने DS-4 (1981), इसके बाद बामसेफ (1978) और अंत में बहुजन समाज पार्टी (1984) का गठन किया। बहुजन समाज पार्टी ने भारत, खासकर उत्तर प्रदेश, मे हजारों जातियों में बटे शोषित पीड़ित समाज को इकट्ठा कर भारत की राजनीति में नये समीकरण गढ़कर भारत राजनैतिक ही नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन की शाश्वत परम्परा को आगे बढ़ाने का ऐतिहासिक कार्य किया।

इस मुहिम के तहत पहली बार 3 जून 1995 को भारत के पिछड़े, अल्पसंख्यक, अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के लोगों की एकमात्र स्वतंत्र बहुजन समाज पार्टी ने भारत की सर्वाधिक आबादी वाले उत्तर प्रदेश की सरजमी पर अपनी स्वतंत्र राजनीति के तहत सरकार बनाई। यह आजाद भारत में देश के वंचित जगत की अपने मुद्दे, अपनी विचारधारा पर आधारित, अपनी पार्टी की अपनी सरकार थी। इसके तहत जहां एक तरफ भारत के लोकतंत्र की गहराती जड़ों का परिचायक थी वहीं दूसरी तरफ भारत में सदियों से गुलाम रहे कौम की बेटी उत्तर प्रदेश में हुकूमत की बागडोर संभालती है।

अपने इस सिलसिलेवार हुकूमत के दरमियान बहुजन विचारधारा, इतिहास, संस्कृति, विचार, संदेश व बहुजन समाज में जन्मे तमाम महानायकों एवं महानायिकाओं के शौर्य, संघर्ष एवं गौरव गाथाओं को जन-जन तक पहुंचा कर भारत में सामाजिक क्रांति का नया इतिहास लिखा। इसलिए 3 जून का भारत के पिछड़े, अल्पसंख्यक, आदिवासी एवं वंचित जगत के लिए बहुत ऐतिहासिक व महत्वपूर्ण दिन है। यही वजह है कि 03 जून 2020 को प्रख्यात समाज विज्ञानी प्रो. विवेक कुमार ने एक यूट्यूब वीडियो में और युवा सामाजिक कार्यकर्ता व चिंतक रजनीकान्त इन्द्रा ने आनलाइन वेबिनार के जरिए 3 जून के ऐतिहासिक दिन को सामाजिक परिवर्तन दिवस के तौर पर सेलिब्रेट करने की अनोखी पहल की।

इस ऐतिहासिक अवसर पर पिछली बार सिर्फ दो कार्यक्रम (प्रो विवेक कुमार और रजनीकान्त इन्द्रा) हुए थे। इससे लोगों को इस दिन की ऐतिहासिकता व महत्ता की जानकारी हुई। इस बार वर्ष 2021 में रजनीकान्त इन्द्रा ने 03 जून की ऐतिहासिकता का जिक्र 26 मई 2021 और 30 मई 2021 को छत्तीसगढ़ और दिल्ली के बुद्ध-फूले-अम्बेडकरी साथियों द्वारा आयोजित वेबिनार के जरिए चर्चा के केन्द्र में स्थापित कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि छत्तीसगढ़ के साथियों ने भी 03 जून को सामाजिक परिवर्तन दिवस के तौर पर स्वीकार करते हुए एक और वेबिनार आयोजित किया जिसमें रजनीकान्त इन्द्रा ने ना सिर्फ 03 जून की ऐतिहासिकता व महत्ता को बताया बल्कि दौरान बहुजन आंदोलन के रास्ते में खड़े तमाम संगठनों में से बुद्ध फूले शाहू अंबेडकर के वैचारिकी वाले अपने संगठन की पहचान कैसे करें, पर विस्तृत चर्चा की। साथ ही रजनीकान्त इन्द्रा ने सामाजिक परिवर्तन दिवस को विमर्श में लाने के लिए 03 जून 10 बजे दिन में #सामाजिक_परिवर्तन_दिवस नाम से ट्विटर ट्रेंड चलाने की भी अपील की।

हमें पूर्ण विश्वास है कि आने वाले समय में प्रो विवेक कुमार का आइडिया और इस आइडिया को जन-जन तक पहुंचाने में रजनीकान्त इन्द्रा द्वारा की गई मेहनत बहुजन आंदोलन को नई बुलंदियों पर पहुंचाने में मील का पत्थर साबित होगी।

लेखिका युवा सामाजिक कार्यकर्ता हैं। लेख में व्यक्त विचार लेखिका की निजी राय है।

हमसे जुड़ें

502FansLike
5FollowersFollow

ताजातरीन

सम्बंधित ख़बर