गोदी मीडिया (?) को किसानों के जवाब ‘द ट्राली टाइम्स’ से सीखे बहुजन समाज

केंद्र के कृषि कानूनों का विरोध कर रहे भारत के किसानों ने अपना नया अखबार निकाल लिया है। ‘द ट्रॉली टाइम्स’ नाम से शुरू यह अख़बार भारत की उस कॉर्पोरेट संचालित मीडिया को किसानों का जवाब है जो किसान आंदोलन और किसानों को कभी खालिस्तानी, कभी गुमराह, कभी बहका हुआ तो कभी टुकड़े टुकड़े गिरोह द्वारा सदस्य बताता है लेकिन सत्ता से सवाल पूछने में उसकी जबान को लकवा मार जाता है। और खास बात यह है कि ऐसा सिर्फ किसानों के मुद्दे पर ही नहीं हो रहा है बल्कि बहुजन समाज अर्थात दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के सरोकारों से जुड़े विषयों पर भी इस मीडिया का रवैया ठीक ऐसा ही रहता है। वैसे तो मीडिया के इस चाल, चरित्र और चेहरे के अनेक स्पष्टीकरण दिए जा सकते हैं लेकिन असल में भारत का मीडिया (कुछेक अपवादों को छोड़कर) अपने वर्गीय हितों को लेकर बेहद ईमानदार है जिसे समझे बिना उसका मुकाबला नहीं किया जा सकता। ‘द ट्राली टाइम्स’ के बहाने से ही सही हमें इस मुद्दे पर एक बार फिर से बहस छेड़ने की जरुरत है कि भारत का बहुजन समाज इस मीडिया का कैसे मुकाबला कर सकता है और ‘द ट्राली टाइम्स’ कैसे एक बेहतरीन सबक है?

भारत के तथाकथित मेनस्ट्रीम मीडिया में हाशिये का समाज पूरी तरह से हाशिये पर है। देश की अदालतों की तरह ही मेनस्ट्रीम मीडिया में भी सामाजिक विविधता का घोर अभाव दिखता है। पत्रकारिता के श्रेष्ठतम संस्थानों से पढ़कर निकलने के बावजूद आपको इन मीडिया घरानों में शायद ही दलित, आदिवासी या पिछड़ा वर्ग के लोग किसी निर्णयकारी पद पर मिलेंगे। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि लगभग सारे के सारे मीडिया घराने कॉर्पोरेट के पैसे से चलते हैं जिनके पीछे किसी न किसी राजनीतिक दल का प्रत्यक्ष या परोक्ष हाथ देखा जा सकता है। दलित, आदिवासी या पिछड़ा वर्ग के देश में कितने धन कुबेर हैं, या फिर इनकी कितनी पार्टियां है जिनकी आज ऐसी हैसियत है? इक्का दुक्का राजनीतिक दलों को मौका मिला भी तो उनके नेतृत्व में इतनी समझ ही नहीं थी कि वह इस तरफ ध्यान दे। ऐसे में अगर कोई यह उम्मीद रखता है कि एक गैर दलित, गैर आदिवासी, गैर पिछड़ा नेतृत्व की राजनीतिक पार्टी समर्थित गैर बहुजन कॉर्पोरेट समूह अपने संसाधनों को खर्च कर इन हाशिये के वर्गों को या इनके मुद्दों को मंच देगा तो इसे उसकी नासमझी ही समझा जाना चाहिए।

चाहें चौबीसों घंटे चलते मीडिया चैनल हो या अख़बार, वह सिर्फ एक मुखौटा हैं। असली चेहरा इस मुखौटे के भीतर है जिसके हाथ में सबकी चाबी है, और जो अलग अलग पैकेजिंग में आपको खबर के रूप में अपने एजेंडे को परोसता है। लेफ्ट, राइट, सेंटर का सिर्फ भ्रमजाल है क्योंकि सबकी डोर एक ही के हाथ में है। इस स्थिति से बाहर निकलना तब तक संभव नहीं है जब तक मीडिया में सामाजिक विविधता का समावेशन नहीं होता। यह विविधता स्वामित्व से लेकर हर स्तर तक दिखनी चाहिए। इसके लिए बहुजन समाज को सामूहिक जिम्मेदारी उठानी होगी। ‘द ट्राली टाइम्स’ को कॉर्पोरेट ने नहीं बल्कि लोगों के सामूहिक प्रयास और योगदान ने संभव बनाया है। बहुजन समाज के बुद्धिजीवी, व्यापारी, राजनेता सब मिलकर अगर थोड़ा थोड़ा भी सहयोग करें तो बहुजनों के पास ‘द ट्राली टाइम्स’ जैसे एक दो नहीं बल्कि सैकड़ों अख़बार हो सकते हैं। ‘द ट्राली टाइम्स’ के महत्व का आकलन इस बात से नहीं होना चाहिए कि इसका स्वरुप कितना बड़ा है, इसमें कितने बड़े नाम जुड़े हैं, इसका कलेवर कैसा है बल्कि इसका असली महत्व इस बात में निहित है कि यह अन्याय, झूठ, गैर समावेशीकरण और बाजारीकरण के नाम पर लोकतंत्र के चौथे खम्भे द्वारा लोक की अनदेखी और उससे भी आगे बढ़कर लोक के साथ विश्वासघात के विरुद्ध लोक के विद्रोह का प्रतीक है। बहुजन समाज को अगर अपनी आवाज खुद बनानी है तो उसके लिए ‘द ट्राली टाइम्स’ एक बेहतरीन उदाहरण है।

हमसे जुड़ें

502FansLike
5FollowersFollow

ताजातरीन

सम्बंधित ख़बर